“ये चिंता और चिंतन दोनो का विषय है”

आज सभी शिक्षित, बुध्दिजीवी वरिष्ठ, युवा , अनुभवी राजनेतिक या सामाजिक अम्बेकरवादी संगठन *आरक्षण* को लेकर चिंतित है ओर इसे बचाने इसकी सुरक्षा हेतु किसी मंच पर बात न हो ये तो सम्भव ही नही है।
हम सभी इस बात से डरते हैं कि किसी दिन पूरी तरह *आरक्षण* खत्म न कर दिया जाए और हम पूरी तरह अपने वो सभी अधिकार न खो दें जो बाबा साहेब डॉ बी आर अम्बेडकर जी ने समाज को दिये।
मैं ये बात पूरे विश्लेषण के साथ कह सकता हूँ कि चाहे सरकार हमारे कितने भी विरोध में है लेकिन आने वाले 10 साल तक वो आरक्षण को लेकर कोई भी बड़ा फैसला नही लेगी ओर 10 साल के बाद उन्हें कोई फैसला लेनी की जरूरत ही नही पड़ेगी।
क्योकि
हमारी विरोधी सरकार आरक्षण को लागू रखते हुए ऐसी व्यवस्था बनाती जा रही हैं कि ये हो या न भी हो कोई फर्क नही पड़ेगा।
हमे *आरक्षण बचाओ* मुद्दे के साथ साथ अब सरकार को सभी सरकारी संस्थाओं/उधोगो/ कम्पनियों का निजीकरण करने से रोकने के लिये कदम बढ़ाने चाहिए क्योंकि एक आंकड़े के अनुसार देश की सरकार लगभग 60% सरकारी संस्थाओं का निजीकरण कर चुकी है जिनमे हमारे लिये विकास की नीतियां लागू होती थी और हम एक अधिकार से वहाँ अपना हक मांग सकते थे।
अगर ऐसे ही निजीकरण की दर बढ़ती गयी तो *आरक्षण* केवल  संविधान और सामान्य ज्ञान के प्रश्न से ज्यादा कोई मायने नही रखेगा।
एक समस्या और बढ़ती जा रही है की दूसरी जातियाँ भी आरक्षण की माँग उठाती है  सरकार द्धारा आरक्षण न देने की स्थिति में हमारा आरक्षण खत्म करनी की भी बराबर माँग करती है इसलिये हम विकट समस्या में है।
ये कोई और लोग नही है बल्कि इसके पीछे विरोधी ताकतों का समर्थन है।
अब ये हमे तय करना चाहिये के हमे किस ओर ज्यादा प्रयास करने की जरूरत है।
ये चिंता और चिंतन दोनो का विषय है।
जय भीम नमो बुद्धाय
(मदन ओम राय)
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