“देश किस ओर जा रहा है?”

21वीं सदी चल रही है विश्व में एक से बड़कर एक मुकाम हासिल किए जा रहे हैं ऐसा नहीं कि भारत तरक्की नहीं कर रहा है भारत भी तरक्की कर रहा है। एक से बढ़ के एक मुकाम हासिल किए जा रहे हैं वो मुकाम और भी तेजी से हासिल किए जा सकते हैं, भारत देश को विश्व गुरू बनाया जा सकता है अगर हम मिल जुल कर रहें, आपस में भाई चारा बढ़ाएं और किसी के कहे अनुसार चलें जैसे कहा गया है
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई।
आपस में हैं भाई भाई।

लेकिन किसी को कहां देश की सुध है सब अपने उल्लू सीधा करने और अपने आप को बड़ा बताने में लगे हुए हैं। कोई फर्जी देशभक्ति के नाम पे लड़वा रहा है,कोई धर्म के नाम पर तो कोई जाति के नाम पर ये तो देश की स्तिथि है
अगर हमारे देश में भावनाओं से खेलना बन्द कर दिया जाए तो देश विश्व गुरु बन सकता है देश में प्रतिभाएं हैं लेकिन उन्हें निखारने की बजाय उन्हें उलझाए रखा जाता है
धार्मिक भावनाओं में, जातिगत भावनाओं में यही नहीं रुक रहा है और एक नया मुकाम दिया जा रहा है देश को आजकल एक फर्जी देशभक्ति की भावनाएं जगाने का। ये ऐसी मुहिम चल रही है जो किसी भी व्यक्ति को देशद्रोही, गद्दार बता के समाज में एक अशांति की भावनाएं फैलाते हैं।
धार्मिक भावनाओं और जातिगत भावनाओं से तो देश की सियासत चलती है
लेकिन यह सब देख कर ऐसा लगता है कि 17वीं या 18वीं सदी में जी रहे हैं जहां देश बहुत सारी कुरीतियों से घिरा हुआ था इन सब कुरीतियो के खत्म करने के लिए कितने महापुरुषों ने अपना जीवन कुर्बान किया लेकिन आज भी वही समाज जब देखने को मिलता है तो बहुत दुख होता है कि आखिर कौन से लोग हैं जो महापुरुषों की कुर्बानियों को भुला कर देश को उसी गर्त में ले जा रहे हैं जहां नर्क का एहसास पृथ्वी पर ही हो जाता है।
देश में कभी किसी को मार दिया जाता है
क्योंकि वह किसी को अपने बहु-बेटियों के शौच के समय फ़ोटो लेने से रोकता है,
किसी को मार दिया जाता है क्योंकि वह मांस खाता है, किसी को मार दिया जाता है क्योंकि वह टोपी पहनता है,
किसी को मार दिया जाता है क्योंकि वह व्यापार करता और दूध बेचने के लिए गाय लेने जाता है ।
किसी को मार दिया जाता है क्योंकि वह निष्पक्ष पत्रकारिता करता या करती है।

यही नहीं रुक रहा है समाज अभी तो और कुरीतियां हैं जो कि अगर मूंछ रखते हैं तो मारा जाता है,
मंदिर में जाते हैं तो मारा जाता है,
गरबा देखने जाते हैं तो मारा जाता है,
घोड़ी पर चढ़ते है तो मारा जाता है।
ये सब कुरीतियां कब खत्म होगीं आखिर उन महापुरुषों ने कुर्बानियां दी कि एक नए समाज की स्थापना हो जाय लेकिन समाज ही नहीं तैयार है उनकी बात मानने और एक नए आधुनिक समाज की स्थापना करने को।
कुछ लोग कहते हैं बड़े-बड़े लोग आए लेकिन समाज ना सुधरा ना ही सुधरेगा मैं उन्हीं लोगों से कहता हूं कि आप अपने आप में परिवर्तन लाओ महापुरुषों को अनुसरण करो सब सुधार में आ जाएंगे।
जैसे बूँद बूँद से ही घड़ा भरता है
ठीक उसी प्रकार से आप अपने अंदर से धार्मिक, जातिगत लड़ाईयों से ऊपर उठकर सोचो और कुछ करो सब अपने आप ठीक हो जाएगा।

डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति nationtimenews.com उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार nationtimenews.com के नहीं हैं, तथा nationtimenews.com उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

लेखक- दीपक पांडेय, समाजसेवी एवं युवा नेता, बीएसपी

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