बधाई हो धर्म के ठेकेदारों आपका लगाया पेड़ अब ‘फल’ देने लगा है

पिछले कुछ सालों में हिंदू-मुस्लिम और लव जिहाद के नाम पर जो नफरत के बीज बोए जा रहे थे उस नफरत के पेड़ पर अब फल आने लगे हैं और पहला फल राजस्थान में मिला है, जहां एक आदमी ने लव जिहाद के नाम पर एक मुस्लिम को दिनदहाड़े काट दिया और उसे आग के हवाले कर दिया। इस पूरी घटना का उसने वीडियो भी बनाया..अजीब बात है कि लव जिहाद का जो शिकार बना है वो एक बुजुर्ग इंसान है जिसका नाम भट्टा शेख बताया जा रहा है। शायद उसे लव जिहाद का मतलब भी न पता हो। तभी जब उसपर धारदार हथियार से पहला हमला हुआ तो गिड़गिड़ाते हुए अपना कसूर पूछता है.. क्या हुआ सर? लेकिन बेरहम हमलावार लगातार हमला करता रहा और भट्टा शेख चीखता रहा।
दरअसल, ये हमला किसी इंसान ने नहीं….बल्कि एक विकृत मानसिकता ने किया है। क्योंकि अगर कोई इंसान हमला करता है तो उसे मारने के बाद चिंता या परेशानी होती है। लेकिन इस आदमी ने मारते समय न कोई दया दिखाई और न मारने के बाद इसे कोई पछतावा हुआ, बल्कि इसके उलट उसे ऐसा करने पर गर्व है।

मारने वाला शख्स शंभुनाथ इस हद तक नफरत का शिकार है कि एक निहत्थे बुजुर्ग को काटकर और थोड़ी सी जान बची होने पर जलाकर कैमरे पर साफ कहता है कि उसे नहीं पता कि उसने सही किया या गलत किया, पर उसे जो ठीक लगा, वो कर दिया। वीडियो में ये शख्स एेसे ही और भी अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने को कहता है।

क्या आपको नहीं लगता कि ऐसी मानसिकता को पिछले कुछ समय में धर्म के कथित ठेकेदारों और कुछ नेताओं ने अपने वोट बैंक के लिए विकृत रुप दे दिया है। इस हत्या के लिए क्या अकेला यही आदमी दोषी हैनहीं बल्कि दो लोगों के सहज प्रेम को जिहाद ठहरा कर हिंदू युवकों को सरेआम हत्याओं को उकसाने वाले ज्यादा दोषी हैंअसल गुनहगार वे लोग हैंजिन्होंने यह ज़हर भरा है। अब कहां हैं साध्वी और साक्षी महाराज जैसे लोग जो लव जिहाद को हिंदू धर्म के लिए खतरा बताकर युवाओं को भड़काने का काम करते आ रहे हैं और कहां हैं वे स्टार पत्रकार जो लव-जिहाद को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बता रहे थे। ये घटना तो उस नफरत के पेड़ का पहला पका हुआ फल है..जो आज खुद गिरा है..लेकिन अगर इस पेड़ को जल्द ही ना काटा गया तो इस तरह के और भी फल देखने को मिलेंगे जो कहीं और अभी पकने की तैयारी में होंगे।
जिसके नाम पे करते हो
ये खून खराबा दिन रात ही तुम
वो भी तुमसे पूछेगा
किस ज़ाहिल की औलाद हो तुम
सोचो क्या आज़ाद हो तुम?
भीड़ का हिस्सा बनते हो
बिन जाने बिन समझे ही तुम
आवाम हो इस मुल्क की या
उमड़ता कोई फ़साद हो तुम
सोचो क्या आज़ाद हो तुम?

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