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जानें भारत के वीर शहीद ऊधम सिंह की जिंदगी से जुड़ी खास बातें

आज भारत के वीर सपूत ऊधम सिंह का जन्मदिवस है और इसी अवसर पर आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि कौन थे ऊधम सिंह और कैसे मिली उन्हें शहीद ए आजम की उपाधी।

आपको बता दें कि आज भी पंजाब के जलियावाला बाग में हुए उस नरसंहार कांड की याद आती है तो सभी लोगों की रूह कांप उठती है जो अंग्रेजों ने करीब साल 1919 के समय में किया था। उस समय पंजाब के गवर्नर रहे माइकल डायर के एक आदेश पर सैकड़ों लोगों को गोलियों से छलनी कर दिया गया था।

मारे गए लोग दलीत और पिछड़े समुदाय से थे

जिस हादसे में आधे से ज्यादा लोग दलीत समुदाय से थे और इस घटना में कम से कम एक हजार से भी कही ज्यादा लोग बेमौत मारे गए थे जबकि दो हजार से भी ज्यादा लोग बहुत बुरी तरह घायल हो गए थे। हालांकि, जलियांवाला बाग में हकीकत में मारे लोगों की सही संख्या आज तक भी सामने नहीं आ पाई है।

जलियांवाला बाग के प्रत्यक्षदर्शी उधम सिंह 

भारत के सबसे वीर सपूत उधम सिंह इस बर्बरतापूर्ण हत्या के प्रत्यक्षदर्शी थें जिन्हें इस घटना ने अंदर तक झिंझोर कर रख दिया था। इस घटनाक्रम के बाद जहां एक तरफ से देश में भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की उखाड़ फेंकने की ठान ली तो वहीं दूसरी तरफ उधम सिंह ने जलियांवाला कांड के कम से कम 21 सालों के बाद अंग्रेजों की सरजमीं पर जाकर सभी लोगों की मौत का प्रतिशोध लिया और बिना किसी डर के खुशी खुशी फांसी के तख्ते पर झूल गए। यही एक सबसे खास वजह है कि उन्हें शहीद ए आजम की उपाधि से भी नवाजा गया।

कैसे उधम सिंह ने डायर को उतारा मौत के घाट

आपको बता दें कि जनरल डायर के एक इशारे पर हुए जलियांवाला कांड ने उधम सिंह को इस कदर तक हिला कर रख दिया कि उन्होंने यहां की मिट्टी हाथ में लेकर उसे सबक सिखाने की कसम खा ली थी और क्रांतिकारी घटनाओं में उतर पड़े। उसके बाद उधम सिंह चंदा इकट्ठा करने के लिए देश से बाहर चले गए और क्रांति के लिए धन इकट्ठा किया। इसी बीच देश के कई बड़े क्रांतिकारी एक-एक करके अंग्रेजों से लड़ते हुए जान देते रहे। ऐसी स्थिती में ऊधम सिंह के लिए आंदोलन चलाना काफी मुश्किल हो चला था।

1934 में लंदन पहुंचे उधम सिंह

उधम सिंह के लंदन पहुंचने से पहले ही जनरल डायर की साल 1927 में एक बीमारी की वजह से मौत हो गई। जिसके बाद उधम सिंह ने अपना पूरा ध्यान  माइकल ओ डायर को मारने की तरफ लगा लिया था और किसी तरह से वो छिपते-छिपाते साल 1934 में लंदन पहुंच गए।

माइकल ओ डायर पर गोलियां बरसायी

साथ ही आपको बता दें कि जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन में बैठक थी और इस बैठक में माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में शामिल था। सभा के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर धुआंधार गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं और उसकी तत्काल मौत हो गई। उधम सिंह को फौरन गिरफ्तार किया गया और अदालत ने उन्हें फांसी दे दी।

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