know interesting facts about mirza ghalib

जानें क्यों हफ्तों तक एक ही कमरे में बंद रहते थे मिर्जा गालिब

गूगल ने उर्दू के महाकवि और महान शायर मिर्जा गालिब की 220वीं जयंती पर उनको अपना डूडल समर्पित कर दिया है। मिर्जा गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को मुगल शासक बहादुर शाह के शासनकाल के दौरान आगरा के एक सैन्य परिवार में हुआ था।

आपको बता दें कि गालिब की जिंदगी में ऐसा समय भी आया था जब उन्‍हें मुसलमान होने का टैक्‍स भी देना पड़ता था। ये टैक्‍स उस समय में अंग्रेजों द्वारा लगाया जाता था। जब वह पैसे के मोहताज हो गए तो हफ्तों एक कमरे में खुद को बंद करके रखते थे।

दिल्‍ली में गुजारा लंबा समय

इतना ही नहीं आगरा की जिस हवेली में गालिब का जन्म हुआ था आज उसी जगह पर इंद्रभान इंटर कॉलेज चलता है। कालामहल इलाके की ये हवेली गालिब के नाना की थी। वह इस हवेली में कम से कम 13 साल तक रहे। 13 साल के बाद वह दिल्ली चले गए थे, लेकिन दिल्ली में उनके लिए रहना काफी मुश्किल था।

दारोगा से परमिट के लिए देना पड़ता था टैक्‍स

आपको बता दें कि इतिहासकार राजकिशोर राजे का कहना हैं कि 1857 में मुगल शासक बहादुर शाह जफर के कैद हो जाने के बाद से अंग्रेजों ने दिल्‍ली को खाली करवाना शुरू कर लिया था। उस समय अंग्रेजों के सिवाय यहां और कोई भी मौजूद नहीं था। इसके 15 दिन बाद हिंदुओं को दिल्‍ली लौटने और रहने की इजाजत दें दी गई थी।

उस समय के दो महीने बाद मुसलमानों को भी दिल्‍ली आने की अनुमति मिल तो गई थी, लेकिन इसमें भी एक बड़ी शर्त रखी गई थी। इस शर्त के मुताबिक बताया गया था कि मुसलमानों को दरोगा से यहां रहने के लिए परमिट लेना था। इसके लिए करीब दो आने तक का टैक्‍स हर महीने देना पड़ता था।

थानाक्षेत्र से बाहर जाने की अनुमति किसी को भी नहीं दी गई थी। अगर कोई वहां रहने की रकम नहीं देता था तो उसे दरोगा के एक आदेश पर ही दिल्‍ली से बाहर धकेल दिया जाता था। वहीं, हिंदुओं को इस परमिट की कोई भी जरूरत नहीं होती थी। कुछ ऐसा ही मिर्जा गालिब के साथ भी हुआ। वह दिल्‍ली में हर महीने दो आने अंग्रेजों को दिया करते थे। यहां तक की एक पुस्‍तक ‘गालिब के खत किताब’ में गालिब ने इस परेशानी का जिक्र भी किया है।

हफ्तों रहते थे घर में बंद

राजे ने बताया हैं कि गालिब ने जुलाई 1858 को हकीम गुलाम नजफ खां को एक पत्र लिखा था। दूसरा पत्र फरवरी 1859 को मीर मेहंदी हुसैन नजरू शायर को लिखा गया था। दोनों पत्र में गालिब ने बताया है कि, ‘हफ्तों से इस घर के बाहर न‍हीं निकला हूं, क्योंकि दो आने का टिकट नहीं खरीद पा रहा हूं। घर से निकलूंगा तो दारोगा के हाथो पकड़ लिया जाऊंगा।’

गालिब ने दिल्ली में 1857 की क्रांति भी देखी थी। मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का पतन भी देखा और अंग्रेजों का उत्थान और देश की जनता पर उनके जुल्म को भी गालिब ने अपनी आंखों से देखा।

मिर्जा गालिब के 10 शेर जो बॉ़लीवुड से असल जिंदगी तक है प्रसिद्ध

तुम सलामत रहो हजार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हजार

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लावेगी हमारी फाका-मस्ती एक दिन

मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

न था कुछ तो खुदा था कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
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