why case not filed on sri sri ravishankar

अपने रक्तपात जैसे बयानों से धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले श्री श्री रविशंकर पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं?

देश की मौजूदा सरकार धार्मिक खाई पैदा करके अपना राजनीतिक उल्लू साधने की कोई भी कसर छोड़ना नहीं चाहती। इसलिए वो धार्मिक बयान देने वालों पर कार्रवाई ना करके  और उन मामलों पर मौन साधकर अप्रत्यक्ष रूप से उनका सहयोग ही करती है। आपको बता दें कि हाल ही में दिए गए श्रीश्री रविशंकर के कई बयान इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। चंद रोज पहले एक न्यूज चैनल से बातचीत के दौरान उन्होंने एक किस्म की अंधकारमय भविष्यवाणी प्रस्तुत की कि अगर मंदिर मसले का समाधान जल्द नहीं किया गया तो भारत सीरिया बन सकता है।

अधिक जानकारी के लिए आपको बता दें कि सीरिया विगत कुछ वर्षों से गृहयुद्ध का शिकार है, जिसमें लाखों लोग मारे जा चुके हैं। उनका कहना था, ‘अगर अदालत मंदिर के खिलाफ निर्णय सुनाती है तो रक्तपात जरूर होगा। जैसे कि उम्मीद की जा सकती है कि इन ‘भड़काऊ बयान’ के लिए उनकी काफी भर्त्सना हुई और इस बात को मद्देनजर रखते हुए कि उनका यह बयान ‘संप्रदायों में तनाव’ को बढ़ावा दे सकता है, देश के अलग-अलग हिस्सों में उनके खिलाफ पुलिस में शिकायतें भी दर्ज की गई है।

क्या श्रीश्री को पहले से पता था कि कोई कार्रवाई नहीं होगी? 

विचलित करने वाली बात तो यह हैं कि न ही बयान से उपजा गुस्सा और न ही पुलिस में किसी भी तरह की दर्ज शिकायत का अयोध्या मामले के इन ‘स्वयंभू’ मध्यस्थ कहे जाने वाले इस आध्यात्मिक गुरु पर कोई असर हुआ। इतना ही नहीं रिपोर्टरों से बात करते हुए उन्होंने अपने इसी विवादास्पद बयान को कई बार दोहराया। निश्चित ही वहां मौजूद किसी खबरनवीस ने उनसे यह पूछने की जुर्रत नहीं की कि क्या संविधान द्वारा तय मर्यादाओं का उल्लंघन या तयशुदा कानूनी विधानों की अनदेखी भी इसी दावे में शुमार की जा सकती है।

क्या श्रीश्री को यह नहीं पता होगा कि जहां तक ऐसे बयानों की बात है तो उनके बारे में कानून बिल्कुल स्पष्ट है। भले ही उनके अमल पर कोताही नजर आए, भारत के कानूनों के तहत धर्म के आधार पर दो समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाना एक आपराधिक कार्रवाई है।

संविधान के विरुद्ध है ये बयान 

इसके साथ ही आपको यह भी बता दें कि भारतीय दंड विधान की धारा, दंगा फैलाने की नियत से भड़काऊ कार्रवाई करने के लिए (धारा 153), धर्म के आधार पर दो समुदायों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने के लिए (धारा 153 ए), राष्ट्रीय एकता को बाधा पहुंचाने वाले वक्तव्यों, बयानों (धारा 153 बी), ऐसे शब्दों का उच्चारण जिनके जरिए दूसरे व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को आहत करना (धारा 298), सार्वजनिक शांति व्यवस्था को बाधित करने वाले वक्तव्य (धारा 505 (1), बी और सी) और अलग-अलग तबकों के बीच नफरत, दुर्भावना और दुश्मनी पैदा करने वाले वक्तव्य (धारा 505/2)।

भारतीय दंड विधान की सेक्शन 153 ए या बी के तहत किसी व्यक्ति द्वारा किया जा रहे उल्लंघन के खिलाफ कार्यकारी दंडाधिकारी को कार्रवाई शुरू करने का पूरा अधिकार है। अगर हम आध्यात्मिक गुरु के बयान को बारीकी से देखेंगे तो पता चलेगा कि अगर उनके खिलाफ दायर शिकायतों को प्रथम सूचना रिपोर्टों की शक्ल प्रदान की गयी तो उनके लिए कानूनी पचड़ों से बच निकलना आसान नहीं रहेगा।

कानून के राज को चुनौती दे रहे हैं रविशंकर 

अपने साक्षात्कार में रविशंकर का यह दावा करना कि अगर सर्वोच्च न्यायालय हिंदुत्ववादियों की मांग को खारिज करता है तो हिंदू हिंसा पर उतर आएंगे, इसके जरिए न केवल श्रीश्री रविशंकर कानून के राज को चुनौती दे रहे थे बल्कि संवैधानिक सिद्धांतों पर भी कई बड़े-बड़े सवाल खड़ा कर रहे थे- जिनके सामने जाति, धर्म, जेंडर, नस्ल, समुदाय आदि आधारों पर किसी भी तरह का भेदभाव संभव नहीं है।

साथ ही बताते चले कि इन दिनों उस मामले की सुनवाई आला अदालत कर रही है जिसने यह तय किया है कि उसे एक ‘जमीन के विवाद’ के तौर पर देखेगी और इसकी अगली सुनवाई 14 मार्च को की जाएगी।